कार्यालय Poetry

यूँ जो पलकों को मिला कर नहीं देखा जाता

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

सफ़र पे जैसे कोई घर से हो के जाता है

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

जाने हम ये किन गलियों में ख़ाक उड़ा कर आ जाते हैं

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

नज़्म

ज़ीशान साहिल

दहशत-गर्द शायर

ज़ीशान साहिल

मुझ से ऐसे वामांदा-ए-जाँ को बिस्तर-विस्तर क्या

ज़ेब ग़ौरी

फ़िल्मी इश्क़

ज़रीफ़ जबलपूरी

ज़ख़्म-ए-ताज़ा बर्ग-ए-गुल में मुंतक़िल होते गए

ज़हीर सिद्दीक़ी

कभी कभी कोई चेहरा ये काम करता है

ज़फ़र सहबाई

किसी का हो नहीं सकता है कोई काम रोज़े में

ज़फ़र कमाली

वाँ नक़ाब उट्ठी कि सुब्ह-ए-हश्र का मंज़र खुला

यगाना चंगेज़ी

चलता नहीं फ़रेब किसी उज़्र-ख़्वाह का

यगाना चंगेज़ी

चले चलो जहाँ ले जाए वलवला दिल का

यगाना चंगेज़ी

कोई अपने वास्ते महशर उठा कर ले गया

वलीउल्लाह वली

गिले शिकवे के दफ़्तर आ गए तुम

वजीह सानी

देखने में ये काँच का घर है

वजद चुगताई

तिरी जब नींद का दफ़्तर खुला था

विशाल खुल्लर

आख़िर वो इज़्तिराब के दिन भी गुज़र गए

वारिस किरमानी

एक तारीख़ मुक़र्रर पे तो हर माह मिले

उमैर नजमी

बात कुछ यूँ है कि ये ख़ौफ़ का मंज़र तो नहीं

तन्हा तिम्मापुरी

शौक़ के ख़्वाब-ए-परेशाँ की हैं तफ़्सीरें बहुत

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

वज़ीर का ख़्वाब

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

उर्दू

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

कसरत-ए-औलाद

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

पहले से देखना कहीं बेहतर बनाएँगे

सय्यद अमीनुल हसन मोहानी बिस्मिल

आँखों को मयस्सर कोई मंज़र ही नहीं था

सुहैल अहमद ज़ैदी

मुझ पर ऐ महरम-ए-जाँ पर्दा-ए-असरार कूँ खोल

सिराज औरंगाबादी

बेच दी क्यूँ ज़िंदगी दो-चार आने के लिए

शिवकुमार बिलग्रामी

जब चला वो मुझ को बिस्मिल ख़ूँ में ग़लताँ छोड़ कर

ज़ौक़

वो सनम ख़ूगर-ए-वफ़ा न हुआ

शौक़ देहलवी मक्की

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