दाने Poetry

देखते ही धड़कनें सारी परेशाँ हो गईं

एहतिमाम सादिक़

ख़ाक हो जाएँगे किरदार ये जाने माने

ज़ीशान साजिद

वो दिन गए कि छुप के सर-ए-बाम आएँगे

वज़ीर आग़ा

न आँखें ही झपकता है न कोई बात करता है

वज़ीर आग़ा

सुख़न जिन के कि सूरत जूँ गुहर है बहर-ए-मअ'नी में

वलीउल्लाह मुहिब

मेरे अश्कों की गई थी रेल वीराने पे क्या गुज़रा

वली उज़लत

हुए हम जब से पैदा अपने दीवाने हुए होते

वली उज़लत

अबस तोड़ा मिरा दिल नाज़ सिखलाने के काम आता

वली उज़लत

दावत-ए-इंक़िलाब

वहीदुद्दीन सलीम

मैं ख़ुद अपना लहू पीने लगा हूँ

त्रिपुरारि

जैसे ही ज़ीना बोला तह-ख़ाने का

तालिब जोहरी

मोहताज नहीं क़ाफ़िला आवाज़-ए-दरा का

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

तीर पे तीर निशानों पे निशाने बदले

सय्यद आरिफ़ अली

क्या बला का है नशा इश्क़ के पैमाने में

सिराज औरंगाबादी

जब ध्यान में वो चाँद सा पैकर उतर गया

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

फैमली-प्लैनिंग

शौकत थानवी

मज़रा-ए-दुनिया में दाना है तो डर कर हाथ डाल

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हैरानी का बोझ

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

जो ऐन वस्ल में आराम से नहीं वाक़िफ़

शाह नसीर

बद-गुमानी जो हुई शम्अ' से परवाने को

शाद लखनवी

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

एक हम से तुझे नहीं इख़्लास

मोहम्मद रफ़ी सौदा

लहू में फूल खिलाने कहाँ से आते हैं

सत्तार सय्यद

नासेहा आया नसीहत है सुनाने के लिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

पेश-ए-इदराक मिरी फ़िक्र के शाने खुल जाएँ

सलीम शुजाअ अंसारी

सुकूत-ए-अर्ज़-ओ-समा में ख़ूब इंतिशार देखूँ

सालिम सलीम

ख़्वाब देखे थे सुहाने कितने

साहिर होशियारपुरी

दर खुला सुब्ह को पौ फटते ही मय-ख़ाने का

रियाज़ ख़ैराबादी

जब उठे तेरे आस्ताने से

रज़ा अज़ीमाबादी

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