निदा Poetry

ज़मीं से ता-ब-फ़लक कोई फ़ासला भी नहीं

आरिफ़ अब्दुल मतीन

असातीरी नज़्म

जवाज़ जाफ़री

ज़र्द पत्तों को हवा साथ लिए फिरती है

ज़फ़र रबाब

यहीं आना है भटकती हुई आवाज़ों को

तौक़ीर तक़ी

कोई तासीर तो है इस की नवा में ऐसी

तौक़ीर तक़ी

ग़म-ए-जहाँ में ग़म-ए-यार ज़म न कर पाया

तालिब हुसैन तालिब

इक उम्र हुई और मैं अपने से जुदा हूँ

ताबिश सिद्दीक़ी

दिए का काम अब आँखें दिखाना रह गया है

शाहीन अब्बास

दर-ए-इम्काँ से गुज़र कर सर-ए-मंज़र आ कर

शाहीन अब्बास

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

उसी किनारा-ए-हैरत-सरा को जाता हूँ

सरवत हुसैन

हम झुकाते भी कहाँ सर को क़ज़ा से पहले

सलमा शाहीन

क्यूँ जल-बुझे कहीं तो गिरफ़्तार बोलते

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

शिकवा करने से कोई शख़्स ख़फ़ा होता है

रईस अमरोहवी

खोए गए तो आइने को मो'तबर किया

इक़बाल हैदर

सड़क

इमरान शमशाद

कोई मुज़्दा न बशारत न दुआ चाहती है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये फ़ज़ा-ए-नील-गूँ ये बाल-ओ-पर काफ़ी नहीं

हनीफ़ फ़ौक़

इसी फ़ुतूर में कर्ब-ओ-बला से लिपटे हुए

फ़रियाद आज़र

अफ़्साना-ए-शब-रंग

फ़रीद इशरती

दरबार में अब सतवत-ए-शाही की अलामत

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कुछ मिरे शौक़ ने दर-पर्दा कहा हो जैसे

एहतिशाम हुसैन

अपनों के करम से या क़ज़ा से

अज़ीज़ क़ैसी

बक़ा-ए-दवाम का मुसाफ़िर

अज़ीम कुरेशी

आग जो दिल में लगी है वो बुझा दी जाए

असरा रिज़वी

यहाँ तो हर घड़ी कोह-ए-निदा की ज़द में रहते हैं

अशअर नजमी

दफ़्तर जो गुलों के वो सनम खोल रहा है

अरशद अली ख़ान क़लक़

ज़मीं से ता-ब-फ़लक कोई फ़ासला भी नहीं

आरिफ़ अब्दुल मतीन

दाम-ए-ख़ुशबू में गिरफ़्तार सबा है कब से

अमजद इस्लाम अमजद

आईना देखता हूँ

अख़्तर ज़ियाई

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