दाग़-हा-ए-दिल की ताबानी गई

दाग़-हा-ए-दिल की ताबानी गई

उन के जल्वों की फ़रावानी गई

आश्ना ना-आश्ना से हो गए

अपनी सूरत भी न पहचानी गई

एक दिल में सैकड़ों ग़म का हुजूम

फिर भी उस घर की न वीरानी गई

अब कहाँ वो जज़्बा-ए-महर-ओ-वफ़ा

आदमी से ख़ू-ए-इंसानी गई

आईने में वक़्त के ऐ हम-नफ़स

दोस्तों की शक्ल पहचानी गई

रह गए होश-ओ-ख़िरद के फ़लसफ़े

जुस्तुजू ता-हद्द-ए-इमकानी गई

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' 'वहशत'-ओ-'दाग़'-ओ-'जिगर'

क्या गए 'आसी' ग़ज़ल-ख़्वानी गई

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Dagh-ha-e-dil Ki Tabani Gai In Hindi By Famous Poet Yaqoob Ali Aasi. Dagh-ha-e-dil Ki Tabani Gai is written by Yaqoob Ali Aasi. Complete Poem Dagh-ha-e-dil Ki Tabani Gai in Hindi by Yaqoob Ali Aasi. Download free Dagh-ha-e-dil Ki Tabani Gai Poem for Youth in PDF. Dagh-ha-e-dil Ki Tabani Gai is a Poem on Inspiration for young students. Share Dagh-ha-e-dil Ki Tabani Gai with your friends on Twitter, Whatsapp and Facebook.