बदन के दोश पे साँसों का मक़बरा मैं हूँ

बदन के दोश पे साँसों का मक़बरा मैं हूँ

ख़ुद अपनी ज़ात का नौहा हूँ मर्सिया मैं हूँ

बिला-सबब भी नहीं यासियत तबीअ'त में

अज़ल से ख़ाना-बदोशी का सिलसिला मैं हूँ

मिरा वजूद तुम्हारी बक़ा का ज़ामिन है

तुम्हारे अन-कहे जज़्बों का आइना मैं हूँ

बहारें जिस पे हों नाज़ाँ चमन भी रश्क करे

नज़र-नवाज़ रुतों का वो क़ाफ़िला मैं हूँ

बिछड़ के मुझ से अबस मंज़िलों की चाहत है

जिधर भी जाओगे हर-सम्त रास्ता मैं हूँ

उन आहटों पे मिरी वहम का गुमाँ कैसा

मैं कह चुका हूँ मिरी जान बारहा मैं हूँ

ग़ज़ल है कोई तो मैं भी हूँ लाज़मी हिस्सा

किसी हयात के मिसरे में क़ाफ़िया मैं हूँ

तुम्हें ख़बर हो तो देना पता मुझे 'ज़ाकिर'

जिसे तलाश है ख़ुद की वो गुम-शुदा मैं हूँ

(664) Peoples Rate This

Your Thoughts and Comments

Badan Ke Dosh Pe Sanson Ka Maqbara Main Hun In Hindi By Famous Poet Zakir Khan Zakir. Badan Ke Dosh Pe Sanson Ka Maqbara Main Hun is written by Zakir Khan Zakir. Complete Poem Badan Ke Dosh Pe Sanson Ka Maqbara Main Hun in Hindi by Zakir Khan Zakir. Download free Badan Ke Dosh Pe Sanson Ka Maqbara Main Hun Poem for Youth in PDF. Badan Ke Dosh Pe Sanson Ka Maqbara Main Hun is a Poem on Inspiration for young students. Share Badan Ke Dosh Pe Sanson Ka Maqbara Main Hun with your friends on Twitter, Whatsapp and Facebook.