पेच दे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं न कहीं
पेच दे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं न कहीं
ख़ुद उलझ जाओ ऐ हसीं न कहीं
कभी घबराते हैं तो कहते हैं
कोई बेताब है कहीं न कहीं
बहुत इसरार वस्ल पर नहीं ख़ूब
मुँह से कह दें वो फिर नहीं न कहीं
ज़िक्र जिस ग़मज़दे का होता है
दिल ये कहता है हों हमीं न कहीं
सज्दे करते हैं लोग देर में भी
वाँ भी ऐ यार हों हमीं न कहीं
नाज़ उठाता है नाज़नीनों के
दिल भी हो जाए नाज़नीं न कहीं
सुनते हैं अर्श है रफ़ी बहुत
कोई जानाँ की हो ज़मीं न कहीं
कह रही है फ़सुर्दगी उन की
मर गया है कोई कहीं न कहीं
दिल मिरा ले गए तो हैं ख़ुश ख़ुश
हों जो मेरी तरह हज़ीं न कहीं
आसमाँ जिस को लोग कहते हैं
कोई क़ातिल की हो ज़मीं न कहीं
मुज़्तरिब बे-सबब नहीं 'ज़ेबा'
दिल लगा है मगर कहीं न कहीं
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