शाम-ए-ग़म याद नहीं सुब्ह-ए-तरब याद नहीं

शाम-ए-ग़म याद नहीं सुब्ह-ए-तरब याद नहीं

ज़िंदगी गुज़री है किस तरह ये अब याद नहीं

याद है उतना कि मैं डूब गया पस्ती में

कितनी ऊँची हुई दीवार-ए-अदब याद नहीं

मैं ने तख़्लीक़ किए शेर-ओ-सुख़न के मोती

मेरी तख़्लीक़ का था कौन सबब याद नहीं

जिन के जल्वों से था आबाद जहान-ए-दिल-ओ-जाँ

मेरी नज़रों से निहाँ हो गए कब याद नहीं

आँख में अश्क हैं अश्कों में ग़मों की तल्ख़ी

कैसे होते हैं वो नग़्मात-ए-तरब याद नहीं

इतना ही याद है मुद्दत से ख़फ़ा हैं वो 'ज़ुहैर'

उन की ख़फ़गी का मगर कोई सबब याद नहीं

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