ये तुम से किस ने कहा है कि दास्ताँ न कहो

ये तुम से किस ने कहा है कि दास्ताँ न कहो

मगर ख़ुदा के लिए इतना सच यहाँ न कहो

ये कैसी छत है कि शबनम टपक रही है यहाँ

ये आसमान है तुम उस को साएबाँ न कहो

रह-ए-हयात में नाकामियाँ ज़रूरी हैं

ये तजरबा है इसे सई-ए-राएगाँ न कहो

मिरी जबीन बताएगी अज़्मतें उस की

उसे ख़ुदा के लिए संग-ए-आस्ताँ न कहो

यहाँ मुक़ीम हैं वीरानियाँ रग-ओ-पै में

तुम और कुछ भी कहो उस को शहर-ए-जाँ न कहो

जहाँ जहाँ भी सितम-गर मिलें ज़रूरत है

कि उस मक़ाम को तुम जादा-ए-अमाँ न कहो

मुआ'शरे का असर तो ज़रूर है 'अल्वी'

मिरी ग़ज़ल को ज़माने की दास्ताँ न कहो

(1267) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554