मिज़ाज-ए-सहल-तलब अपना रुख़्सतें माँगे

मिज़ाज-ए-सहल-तलब अपना रुख़्सतें माँगे

सबात-ए-फ़न मगर ऐ दिल अज़ीमतें माँगे

उफ़ुक़ पे हुस्न-ए-अदा के तुलू-ए-मेहर-ए-ख़याल

फ़ज़ा-ए-शेर सहर की लताफ़तें माँगे

मुसिर है अक़्ल कि मंतिक़ में आए उक़्दा-ए-जाँ

क़दम क़दम पे मगर दिल बशारतें माँगे

नई उड़ान को कम हैं ये ज़ौक़ के शहपर

नई हवाओं का हर ख़म ज़िहानतें माँगे

शुऊर के क़द-ओ-क़ामत पे है नज़र किस की

ये फ़र्बा-चश्म ज़माना जसामतें माँगे

नफ़ीस ओ सहल नहीं वज़-ए-शेर की तदरीज

हर एक सोच दिगर-गूँ सी हालतें माँगे

सुकून-ए-तूल-ए-वफ़ा है तलब की कोताही

कि लम्स-ए-याद धड़कती जसारतें माँगे

शुआ-ए-मेहर से धुल जाएँ जैसे माह ओ नज्म

तिरा ख़याल अनोखी तहारतें माँगे

न पूछ 'साज़' को वो तो सराब वालों से

फिरे है कासा-ए-दिल में हक़ीक़तें माँगे

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