मयख़ाने पे छाई है अफ़्सुर्दा-शबी कब से
मयख़ाने पे छाई है अफ़्सुर्दा-शबी कब से
साग़र से गुरेज़ाँ है ख़ुद तिश्ना-लबी कब से
ऐ साया-ए-गेसू के दीवानो बताओ तो
मेआ'र-ए-जुनूँ ठहरी राहत-तलबी कब से
चूसा है लहू जिस ने बरसों मह-ओ-अंजुम का
इंसाँ का मुक़द्दर है वो तीरा-शबी कब से
इक हश्र सा बरपा है ज़िंदाँ से बयाबाँ तक
पाबंद-ए-सलासिल है ईज़ा-तलबी कब से
जिस के लिए साज़ अपना सर फोड़ते फिरते हैं
नग़्मों की वो दौलत है सीने में दबी कब से
जो दार-ओ-रसन को भी ख़ातिर में नहीं लाती
ताज़ीर के क़ाबिल है वो बे-अदबी कब से
फ़ुर्सत ग़म-ए-दौराँ से मिलती ही नहीं 'अरशद'
दिल में लिए फिरते हैं मौज-ए-इनबी कब से
(775) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
अरशद सिद्दीक़ी