मिरे मुद्दआ-ए-उल्फ़त का पयाम बन के आई

मिरे मुद्दआ-ए-उल्फ़त का पयाम बन के आई

तिरी ज़ुल्फ़ की सियाही मिरी शाम बन के आई

हुई काशिफ़-ए-हक़ीक़त ये ज़मीर-ए-मय-कदा की

मिरी बे-ख़ुदी जो दुर्द-ए-तह-ए-जाम बन के आई

तिरी इक अदा थी ये भी गुल-ओ-ख़ार को जगाने

जो नसीम-ए-सुब्ह-गाही का ख़िराम बन के आई

ये सबा की बे-रुख़ी थी सू-ए-आशियाँ जो गुज़री

न सलाम ले के आई न पयाम बन के आई

मिरे ग़म-कदे में फूटी जो शुआ' दाग़-ए-दिल से

वही इक चराग़-ए-ताक़-ए-सर-ए-शाम बन के आई

सर-ए-तूर जिस की जूया थी निगाह-ए-चश्म-ए-मूसा

वही इक झलक फ़रोग़-ए-लब-ए-बाम बन के आई

रुख़-ओ-ज़ुल्फ़ की तमन्ना मिरे दिल को मुज़्दा-बादा

मिरी सुब्ह बन के आई मिरी शाम बन के आई

है बहुत मुहाल इस का जो 'ग़ुबार' मा-बदल हो

मिरी तीरगी-ए-क़िस्मत मिरी शाम बन के आई

(873) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554