शिकस्ता दिल किसी का हो हम अपना दिल समझते हैं
शिकस्ता दिल किसी का हो हम अपना दिल समझते हैं
तिरे ग़म में ज़माने भर के ग़म शामिल समझते हैं
हुई हैं इस क़दर आसानियों से मुश्किलें पैदा
हर आसानी को हम अपनी जगह मुश्किल समझते हैं
वो ख़ुद देखे मगर उस को कोई न देखने पाए
तिरा अंदाज़ हम ऐ पर्दा-ए-हाइल समझते हैं
किसी का हाथ ज़ख़्मों पर किसी का हाथ गर्दन में
मसीहा कौन है और कौन है क़ातिल समझते हैं
हद-ए-दिल से तो बाहर दर्द तेरा हो नहीं सकता
जहाँ तक दर्द है तेरा वहाँ तक दिल समझते हैं
मजाल-ए-दीद की मोहलत न दें लेकिन ये क्या कम है
वो हम को अपनी बज़्म-ए-नाज़ के क़ाबिल समझते हैं
तअय्युन हुस्न-ए-मक़्सद का नहीं इस के सिवा कोई
ठहर जाएँ जहाँ हम बस उसे मंज़िल समझते हैं
कहाँ तक हम मुसलसल रुख़ बदलते जाएँ कश्ती का
वही तूफ़ाँ निकलता है जिसे साहिल समझते हैं
उन्हें फ़ुर्सत कहाँ ये भी ग़नीमत जानिए 'अख़्गर'
कि वो दिल को किसी ता'ज़ीर के क़ाबिल समझते हैं
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हनीफ़ अख़गर