बड़ी इबरत की मंज़िल है ज़मीं गोर-ए-ग़रीबाँ की
बड़ी इबरत की मंज़िल है ज़मीं गोर-ए-ग़रीबाँ की
यहाँ अपनी हक़ीक़त पर नज़र पड़ती है इंसाँ की
यही धुन थी कहीं मेरा दिल-ए-गुम-गश्ता मिल जाए
इसी वहशत में बरसों ख़ाक छानी कू-ए-जानाँ की
जहाँ नब्ज़ें रुकीं दिल सर्द हो दो हिचकियाँ आईं
समझ लीजे कि मंज़िल आ गई गोर-ए-ग़रीबाँ की
न जाएगा मेरे दिल से ख़याल-ए-अबरू-ए-दिलबर
कि तेग़ों ही के साए में तो है जन्नत मुसलमाँ की
फ़ना-ए-इश्क़ हो कर ज़िंदा-ए-जावेद होता है
मिटा कर देखिए हस्ती नहीं मिटती है इंसाँ की
यहाँ रोने से हो मक़्सूद हासिल ग़ैर-मुमकिन है
चलो अब शमएँ भी बुझने लगीं गोर-ए-ग़रीबाँ की
'सफ़ीर' इक ख़्वाब थी ये चंद रोज़ा ज़िंदगी अपनी
अजल से मिल गई ताबीर इस ख़्वाब-ए-परेशाँ की
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