मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो
मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो
ये आते जाते रंग न हों और लफ़्ज़ों की तनवीर न हो
ऐ राह-ए-इश्क़ के राही सुन चल ऐसे सफ़र की लज़्ज़त में
तिरी आँखों में नए ख़्वाब तो हों पर ख़्वाबों की ताबीर न हो
घर आऊँ या बाहर जाऊँ हर एक फ़ज़ा में मेरे लिए
इक झूटी सच्ची चाहत हो रस्मों की कोई ज़ंजीर न हो
जैसे ये मिरी अपनी सूरत मिरे सामने हो और कहती हो
मिरे शाएर तेरे साथ हूँ मैं मायूस न हो दिल-गीर न हो
कोई हो तो मोहब्बत ऐसी हो मुझे धूप और साए में जिस के
किसी जज़्बे का आज़ार न हो किसी ख़्वाहिश की ताज़ीर न हो
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उबैदुल्लाह अलीम