मुझे अपना जल्वा दिखा

सितारे

मुझे अपना जल्वा दिखा

वक़्त के किस ख़ला में

मज़ाहिर की किस कहकशाँ में

ज़माने के किस दुब्ब-ए-अकबर में

तेरा ठिकाना है

लाखों बरस से

तुझे देखने की तलब में

जूँही शाम ढलती है

मैं ख़ुद-ब-ख़ुद खिंचता आता हूँ

इस ग़ार-ए-शब में!

अजब ग़ार है

एक बाज़ार है

सैल-ए-लमआत का

आइने नस्ब हैं

रंग उड़ते हैं

शीशों के पीछे

चमकदार चीज़ों का अम्बार है

रेशमीं थान खुलते हैं

एक एक कर के

तहों पर तहें

लगती जाती हैं

मुक़य्यश, फ़रदार कपड़ों की

आँखों में

चोबी मुनक़्क़श छतों से

उमंडती हुई रौशनी

झिलमिलाती है

लहरों की सूरत

ज़री झालरों पर

मुतल्ला लकीरों पे

चाँदी के पन्नों पे

सिल्की महीन और घने हाशियों पर

सितारे दमकते हैं

मव्वाज जाली से

आवाज़ आती है

देखें जी

बाज़ार में इस से बढ़ कर मुरस्सा

कोई और कपड़ा नहीं है

इसे जो भी पहनेगा

बिल्कुल सितारा लगेगा

सितारे के मानिंद चमकेगा

क्या मैं तुझे देख पाऊँगा

इस लन-तरानी के गुम्बद में

मेरी सदा गूँजती ही रहेगी

न जाने तुझे किस के मल्बूस पर

ख़्वाब की नोक-ए-सोज़न से

टाँका गया है!!

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