कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ

कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ

सिमट के सारा का सारा ही सर में आ गया हूँ

ज़मीं उछाल चुकी आसमाँ ने थामा नहीं

मैं काएनात में बिल्कुल अधर में आ गया हूँ

ये ज़िंदगी भी मिरे हौसलों पे हैराँ है

समझ रही थी कि मैं उस के डर में आ गया हूँ

ज़रा सा फ़ासला मैं ने भी तय किया तो है

अगर से दो क़दम आगे मगर मैं आ गया हूँ

मिरी शनाख़्त की ख़ातिर छपी मिरी तस्वीर

न जीते-जी सही मर के ख़बर में आ गया हूँ

उदास हो गया हूँ फिर से इक ज़रा हँस कर

में घूम-घाम के फिर अपने घर में आ गया हूँ

न आ सका मैं तिरे हाथ की लकीरों में

यही बहुत है तिरी चश्म-ए-तर में आ गया हूँ

ये सोच कर कि न दूँ नाख़ुदा को ये ज़हमत

उतर के कश्ती से ख़ुद ही भँवर में आ गया हूँ

छुपा न पाया कभी ख़ुद को अपने शे'रों में

मैं जो हूँ जैसा हूँ अपने हुनर में आ गया हूँ

(580) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554