घर है तिरा तू शौक़ से आने के लिए आ

घर है तिरा तू शौक़ से आने के लिए आ

लेकिन मैं ये चाहूँगा न जाने के लिए आ

ये रुख़ भी मोहब्बत का दिखाने के लिए आ

आ मुझ से नज़र फेर के जाने के लिए आ

मुद्दत से हूँ मैं तेरी मुलाक़ात का तालिब

आ मुझ पे कोई ज़ुल्म ही ढाने के लिए आ

पैमानों से पीते हैं पिएँ रिंद-ए-ख़राबात

तू मुझ को निगाहों से पिलाने के लिए आ

अर्बाब-ए-ख़िरद को है बड़ा नाज़ ख़िरद पर

तू उन को भी दीवाना बनाने के लिए आ

क्या मैं तिरे इस लुत्फ़ के क़ाबिल भी नहीं हूँ

ऐ जान-ए-वफ़ा दिल ही दुखाने के लिए आ

बर्दाश्त इसे इश्क़ की ग़ैरत न करेगी

क्यूँ तुझ से कहूँ मैं कि ज़माने के लिए आ

(529) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554