शर्मिंदा नहीं कौन तिरी इश्वा-गरी का
शर्मिंदा नहीं कौन तिरी इश्वा-गरी का
बे-वज्ह नहीं मुँह का छुपाना है परी का
जो लब को तिरे देख के बेहोश न होवे
दा'वा उसी को भाता है साहब-जिगरी का
तुम दिल ही में पलते रहे हो सीखा कहाँ से
ऐ अश्क ये शेवा जो लिया पर्दा-दरी का
जिस तरह सुने मुझ से कहे यार से जा कर
ये ढब किसी को आता है पैग़ाम्बरी का
पत्थर से हों दिल यक-निगह-ए-गर्म में पानी
है इश्क़ से ईजाद हुनर शीशागरी का
चल आइना-ख़ाने में कि है ज़ोर-ए-तमाशा
जिस तर्फ़ नज़र कीजिए आलम है परी का
अफ़्सोस शब-ए-हिज्र की शाम आते ही मर गए
क्या क्या था भरोसा हमें आह-ए-सहरी का
कर क़त्ल मुझे शौक़ से बदनामी से मत डर
दस्तूर नहीं कुश्ते पे याँ नौहागरी का
हैरान हूँ आई न नज़र में कमर उस की
दा'वा था मुझे अपनी 'रज़ा' दीदा-वरी का
(520) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554