रौशनी रंगों में सिमटा हुआ धोका ही न हो

रौशनी रंगों में सिमटा हुआ धोका ही न हो

मैं जिसे जिस्म समझता हूँ वो साया ही न हो

आईना टूट गया चुनता हूँ रेज़ा रेज़ा

इसी आईने में मेरा कहीं चेहरा ही न हो

मैं तो दीवार के इस पार रवाँ हूँ कब से

कोई दीवार के उस पार भी चलता ही न हो

वो जो सुनता है मिरी बात बड़े ग़ौर के साथ

बाद जाने के मिरे मुझ पे वो हँसता ही न हो

जागती आँखों में क्यूँ फैलता जाता है ख़ला

खा गई है जिसे दूरी तिरा रस्ता ही न हो

मोड़ हर राह पे पाँव से लिपट जाते हैं

वो मुझे छोड़ के चल दे कहीं ऐसा ही न हो

उस के मिलने पे भी महसूस हुआ है 'सरमद'

उस ने देखा ही न हो मैं ने बुलाया ही न हो

(697) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554