ने ग़रज़ कुफ़्र से रखते हैं न इस्लाम से काम

ने ग़रज़ कुफ़्र से रखते हैं न इस्लाम से काम

मुद्दआ हम को तो साक़ी से है और जाम से काम

दिल-ए-नालाँ को मिरे किस के है आराम से काम

कोई बेचैन रहो अपने उसे काम से काम

इस चमन में न किसी चश्म से पोंछे कोई अश्क

सुब्ह तक हम को भी शबनम यही है शाम से काम

क्यूँ न अफ़ई चले हर एक जगह मकड़ा कर

न पड़ा उस को तिरी ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम से काम

गर अकेला कहीं मिल जाए हमें तो दिल का

लीजे मन-मानता उस शोख़-गुल-अंदाम से काम

हूँ असीर उस का जिसे बाद-ए-गिरफ़्तारी-ए-सैद

न गिरफ़्तार से मतलब रहे ने दाम से काम

है मुबर्रा ये ज़बाँ कहने से अब राम ओ रहीम

जिन ने पाया है निशाँ उस को नहीं नाम से काम

चश्म-ए-ख़ुर्शीद को ग़ुर्फ़े से तिरे दिन सरोकार

रात है दीदा-ए-शबनम को लब-ए-बाम से काम

जो मैं आग़ाज़ तिरे काम का देखा 'सौदा'

वाए वो दिन कि तुझे उस के हो अंजाम से काम

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