क़दम सँभल के बढ़ाओ कि रौशनी कम है
क़दम सँभल के बढ़ाओ कि रौशनी कम है
अगर ये भूल न जाओ कि रौशनी कम है
घरों को आग लगाओ कि रौशनी कम है
यहीं से बात बनाओ कि रौशनी कम है
जवाब ये कि कोई रहनुमा-ए-क़ौम हैं आप
अगर किसी को बताओ कि रौशनी कम है
सहर को शाम समझना जो बस की बात नहीं
यही सवाल उठाओ कि रौशनी कम है
शरीक-ए-बज़्म-ए-सियासत हैं कुछ बुरे चेहरे
ज़रा क़रीब तो आओ कि रौशनी कम है
सदा लगाओ कि आँखें अजीब नेमत हैं
उन्हें यक़ीन दिलाओ कि रौशनी कम है
कहीं झपट न पड़ें दिन में मशअलें ले कर
अवाम को न सुझाओ कि रौशनी कम है
रवा नहीं कि किसी डूबते सितारे को
चराग़-ए-राह बनाओ कि रौशनी कम है
सवाद-ए-शाम के ख़ामोश जुगनुओं से कहो
तुम्हीं चराग़ जलाओ कि रौशनी कम है
ज़रा पहुँच के तो देखो सवाद-ए-मंज़िल तक
तुम इस ख़बर पे न जाओ कि रौशनी कम है
हज़ार साल तो रहता नहीं उबूरी दौर
फ़साद ख़ूब उगाओ कि रौशनी कम है
ये शाएरान-ए-ग़लत-बीं कहेंगे इक दिन 'शाद'
हमें चराग़ दिखाओ कि रौशनी कम है
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शाद आरफ़ी