ज़हर को मय दिल-ए-सद-पारा को मीना न कहो

ज़हर को मय दिल-ए-सद-पारा को मीना न कहो

दौर ऐसा है कि पीने को भी पीना न कहो

न बताओ कि तबस्सुम भी है इक ज़ख़्म का नाम

चाक है किस लिए इंसान का सीना न कहो

कम-निगाहों का है फ़रमान कि ऐ दीदा-वरो

किस लिए तुम को मिला दीदा-ए-बीना न कहो

रख दो इल्ज़ाम किसी मौजा-ए-मासूम के सर

ना-ख़ुदाओं ने डुबोया है सफ़ीना न कहो

हर नफ़स मौत की बख़्शी हुई मोहलत जैसे

कोई जीना है ये जीना इसे जीना न कहो

ये तो फ़नकार की मेहनत का सिला है यारो

मेरे माथे के पसीने को पसीना न कहो

संग-रेज़ों को कहीं ठेस न लग जाए 'शमीम'

मस्लहत है कि नगीने को नगीना न कहो

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