मौसम-ए-गुल तिरे इनआ'म अभी बाक़ी हैं

मौसम-ए-गुल तिरे इनआ'म अभी बाक़ी हैं

शहर में और गुल-अंदाम अभी बाक़ी हैं

और खिल जा कि मआ'रिफ़ की गुज़रगाहों में

पेच ऐ ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम अभी बाक़ी हैं

इक सुबू और कि लौह-ए-दिल-ए-मय-नोशाँ पर

कुछ नुक़ूश-ए-सहर-ओ-शाम अभी बाक़ी हैं

ठहर ऐ बाद-ए-सहर इस गुल-ए-नौ-रस्ता के नाम

और भी शौक़ के पैग़ाम अभी बाक़ी हैं

उट्ठो ऐ शब के ग़ज़ालो कि सहर से पहले

चंद लम्हात-ए-ख़ुश-अंजाम अभी बाक़ी हैं

इंतिज़ार ऐ दिल-ओ-दीदा कि हज़ारों असरार

साए की तरह तह-ए-जाम अभी बाक़ी हैं

खोल कर कीजिए तशरीह-ए-सर-ए-मिस्रा-ए-ज़ुल्फ़

इस नविश्ते में कुछ इबहाम अभी बाक़ी हैं

ऐ सही-क़द तिरी निस्बत से सब ऊँची क़द्रें

बावजूद-ए-रविश-ए-आम अभी बाक़ी हैं

हम में कल के न सही 'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम' 'ज़फ़र'

आज के 'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम' अभी बाक़ी हैं

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