शौक़ रातों को है दरपय कि तपाँ हो जाऊँ

शौक़ रातों को है दरपय कि तपाँ हो जाऊँ

रक़्स-ए-वहशत में उठूँ और धुआँ हो जाऊँ

साथ अगर बाद-ए-सहर दे तो पस-ए-महमिल-ए-यार

इक भटकती हुई आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ हो जाऊँ

अब ये एहसास का आलम है कि शायद किसी रात

नफ़स-ए-सर्द से भी शो'ला-ब-जाँ हो जाऊँ

ला सुराही कि करूँ वहम-ओ-गुमाँ ग़र्क़-ए-शराब

इस से पहले कि मैं ख़ुद वहम-ओ-गुमाँ हो जाऊँ

वो तमाशा हूँ हज़ारों मिरे आईने हैं

एक आईने से मुश्किल है अयाँ हो जाऊँ

शौक़ में ज़ब्त है मलहूज़ मगर क्या मा'लूम

किस घड़ी बे-ख़बर-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ हो जाऊँ

ऐसा अंदाज़-ए-ग़ज़ल हो कि ज़माने में 'ज़फ़र'

दौर-ए-आइंदा की क़द्रों का निशाँ हो जाऊँ

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