लहू को दिल के जो सर्फ़-ए-बहार कर न सके

लहू को दिल के जो सर्फ़-ए-बहार कर न सके

इलाज गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार कर न सके

ख़ुदा न कर्दा गिरे कोई अपनी नज़रों से

न हो कि अपना कोई ए'तिबार कर न सके

भर आई आँख सर-ए-बज़्म हो गए ख़ामोश

हम उन से बात जो बेगाना-वार कर न सके

वो आ गए तो सिमट आए सब निगाहों में

हज़ारों ख़्वाब कि जिन का शुमार कर न सके

तुम्हारे सामने अक्सर रही है नोक-ए-ज़बाँ

वो एक बात जो पायान-ए-कार कर न सके

हुईं जो क़ल्ब में पैवस्त हो गया छलनी

वो हसरतें कि जिन्हें अश्क-बार कर न सके

हरीफ़-ए-काम-ओ-दहन बन गईं फ़ना न हुईं

वो तल्ख़ियाँ कि जिन्हें ख़ुश-गवार कर न सके

किसी से तर्क-ए-तअल्लुक़ जुनूँ की शह पा कर

हज़ार बार किया एक बार कर न सके

(556) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554