शिकवे ज़बाँ पे आ सकें इस का सवाल ही न हो

शिकवे ज़बाँ पे आ सकें इस का सवाल ही न हो

उन से जफ़ा का ज़िक्र क्या जिन को ख़याल ही न हो

दिल ही तो है ज़बाँ नहीं शिकवा नहीं करेंगे हम

लेकिन ये शर्त किस लिए जी को मलाल ही न हो

मिज़्गाँ पे वाँ निगाह-ए-लुत्फ़ होंटों पे याँ हदीस-ए-शौक़

अपने हुदूद से बढ़ें इस की मजाल ही न हो

शौक़ को इंतिज़ार-ए-लुत्फ़ लुत्फ़ को इंतिज़ार-ए-शौक़

बात बने भी क्या जहाँ पुर्सिश-ए-हाल ही न हो

ठेस ग़ुरूर को लगी क़हर बनी निगाह-ए-लुत्फ़

क़हर भी ज़िद से तो अमाँ जिस को ज़वाल ही न हो

लुत्फ़ न था जिसे नसीब क़हर की ताब लाए क्यूँ

इश्क़ की ख़ुद-फ़रेबियाँ जैसे ख़याल ही न हो

'हामिद'-ए-नौ-असीर से चर्ख़-ए-कुहन ने क्या कहा

है वो हयात राएगाँ जो पाएमाल ही न हो

(787) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554