अज़ाब टूटे दिलों को हर इक नफ़स गुज़रा

अज़ाब टूटे दिलों को हर इक नफ़स गुज़रा

शिकस्ता-पा थे गराँ मुज़्दा-ए-जरस गुज़रा

हुजूम-ए-जल्वा-ओ-नैरंगी-ए-तमन्ना से

तमाम मौसम-ए-गुल मौसम-ए-हवस गुज़रा

अजब नहीं कि हयात-ए-दवाम भी बख़्शे

वो एक लम्हा-ए-फ़ुर्क़त जो इक बरस गुज़रा

ये मस्लहत कि कहीं दहर है कहीं फ़िरदौस

वही जो आलम-ए-दिल हम पे हम-नफ़स गुज़रा

ग़म-ए-मआल रहा अर्ज़-ए-शौक़ से पहले

इस एक बात पे क्या क्या न पेश-ओ-पस गुज़रा

कशाकश-ए-ग़म-ए-आज़ादी-ओ-असीरी में

हर आशियाँ पे कोई आलम-ए-क़फ़स गुज़रा

रह-ए-तलब में हैं दर-माँदा राहबर 'ताबिश'

यही है हाल तो ये क़ाफ़िला भी बस गुज़रा

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