किस तरह उस को बुलाऊँ ख़ाना-ए-बर्बाद में

किस तरह उस को बुलाऊँ ख़ाना-ए-बर्बाद में

दिल तअस्सुर चाहता है बे-सदा फ़रियाद में

तीरगी-ए-ख़ुश-गुमाँ है जी जहाँ लगने लगे

शम्-ए-वहशत इक जलाऊँ इस जहान-ए-शाद में

जानती हूँ ये हिकायत फ़स्ल-ए-बर्बादी की है

पर मता-ए-दिल यही है सीना-ए-नाशाद में

वो मिसाल-ए-ख़्वाब-ए-रंगीं अब कहाँ मौजूद है

सो रही हूँ मैं अभी तक ख़्वाब-गाह-ए-याद में

रिश्ता-ए-मुबहम को फिर से जोड़ती है सोच इक

दिल उसी को ढूँढता है एक ख़्वाब-आबाद में

ख़ुश-निगाही उस हरीफ़-ए-जाँ की यूँ अच्छी लगे

मैं तड़पना भी न चाहूँ पंजा-ए-सय्याद में

इस ग़म-ए-वहशत-ज़दा का चारा-जू कोई नहीं

इम्तिहान-ए-ज़ब्त है इक इस ख़राब-आबाद में

हर हिसार-ए-ख़ुश-नुमा को तोड़ती जाती हूँ मैं

एक ख़ू-ए-दश्त-गर्दी है मिरी बुनियाद में

(699) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554