मरते मरते रौशनी का ख़्वाब तो पूरा हुआ
मरते मरते रौशनी का ख़्वाब तो पूरा हुआ
बह गया सारा लहू तन का तो दिन आधा हुआ
रास्तों पर पेड़ जब देखे तो आँसू आ गए
हर शजर साया था तेरी याद से मिलता हुआ
सुब्ह से पहले बदन की धूप में नींद आ गई
और कितना जागता मैं रात का जागा हुआ
शहर-ए-दिल में इस तरह हर ग़म ने पहचाना मुझे
जैसे मेरा नाम था दीवार पर लिक्खा हुआ
ज़ीस्त के पुर-शोर साहिल पर गए लम्हों की याद
जिस तरह साया हो सत्ह-ए-आब पर ठहरा हुआ
ग़म हुए वो आश्ना चेहरों के आईने कहाँ
शहर है सारे का सारा धुँद में लिपटा हुआ
वस्ल के बादल ज़रा थम हुस्न-ए-क़ामत देख लूँ
प्यास का सहरा तो है ता-चश्म-ए-तर फैला हुआ
मुझ को आशोब-ए-हिकायत जान लेने की हवस
और ये तेरा बदन इक दास्ताँ कहता हुआ
ग़म जो मिलता है तो ऐ तौसीफ़ सीने से लगाओ
किस ने लौटाया है यूँ मेहमान घर आया हुआ
(680) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
तौसीफ़ तबस्सुम