अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना
अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना
मुझ को भी किसी और का रस्ता नहीं बनना
कहती है कि आँखों से समुंदर को निकालो
हँसती है कि तुम से तो किनारा नहीं बनना
मोहतात है इतनी कि कभी ख़त नहीं लिखती
कहती है मुझे औरों के जैसा नहीं बनना
तस्वीर बनाऊँ तो बिगड़ जाती है मुझ से
ऐसा नहीं बनना मुझे वैसा नहीं बनना
इस तरह के लब कौन तराशेगा दोबारा
इस तरह का चेहरा तो किसी का नहीं बनना
चेहरे पे किसी और की पलकें नहीं झुकती
आँखों में किसी और का नक़्शा नहीं बनना
मैं सोच रहा हूँ कि मैं हूँ भी कि नहीं हूँ
तुम ज़िद पे अड़ी हो कि किसी का नहीं बनना
मैं रात की ईंटें तो बहुत जोड़ रहा हूँ
पर मुझ से तेरे दिन का दरीचा नहीं बनना
इंकार तो यूँ करती है जैसे कि कभी भी
छाँव नहीं बनना उसे साया नहीं बनना
इस दर्द की तहवील में रहते हुए हम को
चुप-चाप बिखरना है तमाशा नहीं बनना
उस ने मुझे रखना ही नहीं आँखों में 'आमिर'
और मुझ से कोई और ठिकाना नहीं बनना
(1415) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554