हर-चंद तिरी याद जुनूँ-ख़ेज़ बहुत है
हर-चंद तिरी याद जुनूँ-ख़ेज़ बहुत है
मैं जाग रहा हूँ कि हवा तेज़ बहुत है
क्यूँ कर न मिरे तन से छलक जाए ख़मोशी
पैमाना-ए-जाँ ज़ब्त से लबरेज़ बहुत है
क्या कोह-ए-गिराँ ठहरे तिरी राहगुज़र में
ऐ हुस्न तिरी एक ही महमेज़ बहुत है
इक चाँद की कश्ती ही नहीं डूबने वाली
वर्ना वो समुंदर तो बला-ख़ेज़ बहुत है
गुल-दान से लगते ही बिखर जाती है तितली
गोया ये रग-ए-संग भी ख़ूँ-रेज़ बहुत है
पलकों पे कोई फूल नहीं है तो अजब क्या
कहने को तो मिट्टी मिरी ज़रख़ेज़ बहुत है
तुम ख़ुद सा समझ कर न इसे हाथ लगाना
वो ख़ाक का पुतला ही सही तेज़ बहुत है
धरना है कहीं तो ये गिराँ-बारी-ए-ख़ातिर
ज़ानू जो नहीं सर के लिए मेज़ बहुत है
क्या है जो कटोरे के भी पैराक नहीं हम
जीने को तो ये हीला-ए-तबरेज़ बहुत है
'ताबिश' जो गुज़रती ही नहीं शाम की हद से
सोचें तो वहीं रात सहर-ख़ेज़ बहुत है
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अब्बास ताबिश