नक़्श सारे ख़ाक के हैं सब हुनर मिट्टी का है
नक़्श सारे ख़ाक के हैं सब हुनर मिट्टी का है
इस दयार-ए-रंग-ओ-बू में बस्त-ओ-दर मिट्टी का है
कुछ तो अपनी गर्दनें कज हैं हवा के ज़ोर से
और कुछ अपनी तबीअ'त में असर मिट्टी का है
चाँदनी ख़ंदाँ है अपने हुजरा-ए-महताब पर
और मैं नाज़ाँ हूँ इस पर मेरा घर मिट्टी का है
रहमतें बरसा के भी अब्र-ए-करम छटता नहीं
ऐसे लगता है कि साया चर्ख़ पर मिट्टी का है
ख़ाक से उठते नहीं चलती हवा के साथ हम
इज्ज़-ए-ख़ातिर पर बहुत गहरा असर मिट्टी का है
इक नमूना है किसी की सनअत-ए-तिमसाल का
ये जो खिड़की है सदा की ये जो घर मिट्टी का है
क्यूँ न ख़ू-ए-ख़ाक से ख़स्ता रहे मेरी अना
पा-ब-गिल हूँ और ख़मीर-ए-मोतबर मिट्टी का है
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अब्बास ताबिश