शजर समझ के मिरा एहतिराम करते हैं
शजर समझ के मिरा एहतिराम करते हैं
परिंदे रात को मुझ में क़याम करते हैं
सुनो तुम आख़िर-ए-शब गुफ़्तुगू दरख़्तों की
ये कम-कलाम भी क्या क्या कलाम करते हैं
कहाँ की ज़िंदगी हम को तो शर्म मार गई
कि तेरी चीज़ है और तेरे नाम करते हैं
हमें तो इस लिए जा-ए-नमाज़ चाहिए है
कि हम वजूद से बाहर क़याम करते हैं
अगर कभी मुझे मौजूदगाँ से फ़ुर्सत हो
तो रफ़्तगाँ मिरी नींदें हराम करते हैं
लहू के घूँट न पीता तो और क्या करता
वो कह रहे थे तिरा इंतिज़ाम करते हैं
हमें समाअत-ए-बे-लफ़्ज़ की इजाज़त है
हमारे साथ परिंदे कलाम करते हैं
अभी तो घर में न बैठें कहो बुज़ुर्गों से
अभी तो शहर के बच्चे सलाम करते हैं
(1657) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
अब्बास ताबिश