मरने की पुख़्ता-ख़याली में जीने की ख़ामी रहने दो

मरने की पुख़्ता-ख़याली में जीने की ख़ामी रहने दो

ये इस्तिदलाली तर्क करो बस इस्तिफ़हामी रहने दो

ये तेज़-रवी ये तुर्श-रुई चलने की नहीं है दूर तलक

शबनम-नज़री शीरीं-सुख़नी आसूदा-गामी रहने दो

सौ दश्त समुंदर छानो पर आते रहो क़र्या-ए-दिल तक भी

बैरूनी हवा के झोंकों में इक मौज-ए-मक़ामी रहने दो

अब तंज़ पे क्यूँ मजबूर करो हम ग़ैर मुलव्विस लोगों को

फ़न पेश करो ये फ़हरिस्त-ए-असमा-ए-गिरामी रहने दो

रफ़्तार पर इतनी दाद न दो मंज़िल न मिरी छीनो मुझ से

अज़-राह-ए-हुनर मिरे हिस्से की थोड़ी नाकामी रहने दो

जतलाते फिरो गर क़द अपना पैमाइश की मोहलत तो न दो

इस क़ामत-ए-बाला के सदक़े ये ज़ूद-क़यामी रहने दो

अब हम से परेशाँ-हालाँ को क्या अम्न-ओ-सुकूँ रास आएगा

यूँही बोहरानी चलने दो सारा हंगामी रहने दो

ऐ 'साज़' वगर्ना लोग तुम्हें ठहराएँगे साँपों का मस्कन

इस शहर-ए-अक्स-गज़ीदा में आईना-फ़ामी रहने दो

(1303) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554