अगले पड़ाव पर यूँही ख़ेमा लगाओगे

अगले पड़ाव पर यूँही ख़ेमा लगाओगे

जितनी भी है सफ़र की थकन भूल जाओगे

बाहर हवा-ए-तेज़ लगाए हुए है घात

घर से जो निकले अब कि पलट कर न आओगे

हर शख़्स अपने आप में मसरूफ़ है यहाँ

किस को फ़साना-ए-दिल-मुज़्तर सुनाओगे

ताबिंदा-ख़्वाब देख कर आँखें खुलेंगी जब

ज़ुल्मात के बग़ैर यहाँ कुछ न पाओगे

इक दूसरे से हो के अलग ख़ुश रहेगा कौन

तड़पेंगे हम भी ख़ुद भी तुम आँसू बहाओगे

जा तो रहे हो जिंस-ए-वफ़ा की तलाश में

साथ अपने यासियत के सिवा कुछ न लाओगे

गिर्दाब सामने है मुख़ालिफ़ हवाएँ हैं

कश्ती को कैसे जानिब-साहिल घुमाओगे

जिस को ख़ुलूस समझे हुए थे वो क्या हुआ

कितना यक़ीन था तुम्हें धोका न खाओगे

पर्बत हैं बर्फ़-पोश क़दम देख-भाल कर

'आबिद' फिसल गए तो सँभलने न पाओगे

(1192) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554