ऐसा भी नहीं उस से मिला दे कोई आ कर

ऐसा भी नहीं उस से मिला दे कोई आ कर

कैसा है वो इतना तो बता दे कोई आ कर

ये भी तो किसी माँ का दुलारा कोई होगा

इस क़ब्र पे भी फूल चढ़ा दे कोई आ कर

सूखी हैं बड़ी देर से पलकों की ज़बानें

बस आज तो जी भर के रुला दे कोई आ कर

बरसों की दुआ फिर न कहीं ख़ाक में मिल जाए

ये अब्र भी आँधी न उड़ा दे कोई आ कर

ये कोह ये सब्ज़ा ये मचलती हुई नदियाँ

मर जाऊँ जो मंज़िल का पता दे कोई आ कर

हर घर पे है आवाज़ हर इक दर पे है दस्तक

बैठा हूँ कि मुझ को भी सदा दे कोई आ कर

इस ख़्वाहिश-ए-नाकाम का ख़ूँ भी मिरे सर है

ज़िंदा हूँ कि इस की भी सज़ा दे कोई आ कर

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