किसी जानिब से भी परचम न लहू का निकला

किसी जानिब से भी परचम न लहू का निकला

अब के मौसम में भी आलम वही हू का निकला

दस्त-ए-क़ातिल से कुछ उम्मीद-ए-शफ़ा थी लेकिन

नोक-ए-ख़ंजर से भी काँटा न गुलू का निकला

इश्क़ इल्ज़ाम लगाता था हवस पर क्या क्या

ये मुनाफ़िक़ भी तिरे वस्ल का भूका निकला

जी नहीं चाहता मय-ख़ाने को जाएँ जब से

शैख़ भी बज़्म-नशीं अहल-ए-सुबू का निकला

दिल को हम छोड़ के दुनिया की तरफ़ आए थे

ये शबिस्ताँ भी इसी ग़ालिया-मू का निकला

हम अबस सोज़न-ओ-रिश्ता लिए गलियों में फिरे

किसी दिल में न कोई काम रफ़ू का निकला

यार-ए-बे-फ़ैज़ से क्यूँ हम को तवक़्क़ो' थी 'फ़राज़'

जो न अपना न हमारा न अदू का निकला

(1912) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554