न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका

न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका

न वो दर बचा न वो घर बचा तेरे बा'द कोई न आ सका

न वो हिस किसी में न ताब है मिरा ग़म तो ख़ैर उठाए कौन

वो जो मिस्रा ग़म का था तर्जुमाँ कोई उस को भी न उठा सका

कभी ख़ौफ़ था तिरे हिज्र का कभी आरज़ू के ज़वाल का

रहा हिज्र-ओ-वस्ल के दरमियाँ तुझे खो सका न मैं पा सका

मिरे दिल में तुख़्म-ए-यक़ीन रख दे लचक तू शाख़-ए-मिज़ाज को

वो चमन खिला मिरे बाग़बाँ जो चमन कोई न खिला सका

मिरे साथ सु-ए-जुनून चल मिरे ज़ख़्म खा मिरा रक़्स कर

मिरे शेर पढ़ के मिलेगा क्या पता पढ़ के घर कोई पा सका?

जो लिखो इबारत-ए-इश्क़ तुम तो अना का कोई न पेच हो

जो लब-ए-दवात पे झुक गया वो क़लम ही नक़्श बना सका

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