जाँ-सिपारी के भी अरमाँ ज़िंदगी की आस भी
जाँ-सिपारी के भी अरमाँ ज़िंदगी की आस भी
हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-अलम भी नीश-ए-ग़म का पास भी
ख़ाक दर-बर ही सही मैं ख़ाक भी वो ख़ाक है
जिस में मेरे ज़ख़्म-ए-दिल की बू भी है और बास भी
कितने दौर-ए-चर्ख़ उन आँखों ने देखे कुछ न पूछ
मिट चुका है वक़्त की रफ़्तार का एहसास भी
हाए वो इक नश्तर-आगीं नेश्तर-अफ़रोज़ याद
जिस के आगे हेच अपनी बुर्रिश-ए-इंफ़ास भी
हम न थे कुछ ख़ुद ही उस सौदे पे राज़ी वर्ना यूँ
रास आने को ये दुनिया आ ही जाती रास भी
ख़ुद को ऐ दिल यास-ए-कामिल के हवाले यूँ न कर
झाँकती है ज़ेहन के ग़ुर्फ़े से कोई आस भी
कौन उस वादी से उछला ता-सर-ए-अर्श-ए-बरीं
गुम हैं जिस वादी में 'अख़्तर' ख़िज़्र भी इल्यास भी
(982) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
अख़्तर अंसारी