घबराएँ हवादिस से क्या हम जीने के सहारे निकलेंगे
घबराएँ हवादिस से क्या हम जीने के सहारे निकलेंगे
डूबेगा अगर ये सूरज भी तो चाँद सितारे निकलेंगे
अंदाज़-ए-ज़माना कहता है फिर मौज-ए-हवा रुख़ बदलेगी
अँगारों से गुलशन फूटेगा शबनम से शरारे निकलेंगे
फ़िरदौस-ए-नज़र के दीवाने तारीक फ़ज़ा से क्या डरना
तू शम-ए-नज़र को तेज़ तो कर ज़ुल्मत से नज़ारे निकलेंगे
अंजाम-ए-कशाकश होगा कुछ देखें तो तमाशा दीवाने
या ख़ाक उड़ेगी गर्दूं पर या फ़र्श पे तारे निकलेंगे
'मसरूर' करें अहल-ए-साहिल कुछ फ़िक्र न हिम्मत वालों की
डूबेंगे सफ़ीने जितने भी इक दिन वो किनारे निकलेंगे
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अलीम मसरूर