लरज़ लरज़ के दिल-ए-ना-तवाँ ठहर ही न जाए
लरज़ लरज़ के दिल-ए-ना-तवाँ ठहर ही न जाए
फ़िराक़-ए-साज़ कहीं रूह-ए-नग़्मा मर ही न जाए
उतार ले किसी शीशे में साअत-नग़्मा
सदा-ए-क़ाफ़िला-ए-गुल कहीं बिखर ही न जाए
सुना भी दे किसी गुल को फुसून-ए-तन्हाई
रह-ए-ख़याल से ये कारवाँ गुज़र ही न जाए
है एक क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ क़र्या-ए-जुनूँ से उधर
यहाँ जो आए कोई उस की फिर ख़बर ही न जाए
किसी को मोहलत-ए-हस्ती भी दे ग़म-ए-जानाँ
ये क्या कि आए कोई तो पलट के घर ही न जाए
वो ख़ुश-मिज़ाज है उस को अलम से क्या निस्बत
सुना न इश्क़ का ग़म, इश्क़ से वो डर ही न जाए
निगाह-ए-यार, ग़म-ए-जाँ-गुसिल का क्या होगा
तिरे करम से नसीब-ए-वफ़ा सँवर ही न जाए
बहा दे आज कुछ आँसू कि फिर ग़नीमत हैं
चढ़ा है आज जो दरिया वो कल उतर ही न जाए
बजा कि जाँ से गुज़रना बहुत कठिन है मगर
तिरे निसार कोई ऐसा काम कर ही न जाए
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असलम अंसारी