जो तुम और सुब्ह और गुलनार-ए-ख़ंदाँ हो के मिल बैठे

जो तुम और सुब्ह और गुलनार-ए-ख़ंदाँ हो के मिल बैठे

तो हम भी उन में बा-चाक-ए-गरेबाँ हो के मिल बैठे

नहीं खुलते जो लूँ उस शहद-लब से बोसा-ए-सानी

ये लब यूँ बोसा-ए-अव्वल में चस्पाँ हो के मिल बैठे

उड़ा दूँ धज्जियाँ दिल की अगर इन में से कोई भी

क़बा-ए-सुर्ख़ में तेरी गरेबाँ हो के मिल बैठे

ये जुज़्व-ए-हम-दिगर हैं ऐ कमाँ-अबरू ओजब मत कर

जो दिल तेरे सर-ए-नावक पे पैकाँ हो के मिल बैठे

अभी दिल जम्अ है ऐ शाना कर जल्दी सुराग़ इस का

मबाद उस ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं में परेशाँ हो के मिल बैठे

सुना ऐ तिफ़्ल जब मुज़्दा तिरी मकतब-नशीनी का

ये अज्ज़ा-ए-दिल-ए-सीपारा क़ुरआँ हो के मिल बैठे

हमारा रश्क से दिल जल के ख़ाकिस्तर हो या क़िस्मत

और इन दामों में मिस्सी ज़ेब-ए-दंदाँ हो के मिल बैठे

ये वो मजमा नहीं नासेह जहाँ हो दख़्ल दाना को

मगर तुझ सा कोई मक्कार नादाँ हो के मिल बैठे

ये इंसाँ ज़ा परी-वश ऐसे दिलकश हैं कि बे-वहशत

परी आवे अगर इन में तो इंसाँ हो के मिल बैठे

ये अतफ़ाल-ए-हसीं आशिक़ का जी लेने में शैताँ हैं

जिए आशिक़ वही उन में जो शैताँ हो के मिल बैठे

'बक़ा' हम गब्र-ए-ना-मुस्लिम थे पर आ कर ब-नाचारी

वो मुस्लिम-ज़ादा तिफ़्लों में मुसलमाँ हो के मिल बैठे

(868) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554