रुख़ तुम्हारा हो जिधर हम भी उधर हो जाएँगे
रुख़ तुम्हारा हो जिधर हम भी उधर हो जाएँगे
तुम से बिछड़ेंगे अगर तो दर-ब-दर हो जाएँगे
ज़िंदगानी के सफ़र में लुत्फ़ होगा तब नसीब
हम-ख़याल-ओ-हम-नवा जब हम-सफ़र हो जाएँगे
आसमानों का सफ़र हम तय करेंगे एक रोज़
जब हमारे हौसलों में बाल-ओ-पर हो जाएँगे
सादगी यूँही अगर लादे रहे तो एक दिन
सब तुम्हारे अपने तुम से बे-ख़बर हो जाएँगे
देखना जिस दिन उन्हें मक़्सद समझ में आएगा
मंज़िलों की जुस्तुजू में रहगुज़र हो जाएँगे
पौदे हैं उर्दू अदब के आब-ओ-दाना डालिए
आने वाले कल में साए और समर हो जाएँगे
साक़ी साग़र की ज़रूरत ही कहाँ मेरे लिए
तेरी आँखों के ही प्याले पुर-असर हो जाएँगे
वो न जाएँगे कभी 'महताब' ज़ुल्मत की तरफ़
वक़्त पर अंजाम से वाक़िफ़ अगर हो जाएँगे
(755) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
बशीर महताब