अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता
बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता
जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता
मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता
न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर
अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता
रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी
क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता
ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है
ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता
अगर दम भर भी मिट जाती ख़लिश ख़ार-ए-तमन्ना की
दिल-ए-हसरत-तलब को अपनी हस्ती से गिला होता
(1338) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
चकबस्त ब्रिज नारायण