अक़्ल पहुँची जो रिवायात के काशाने तक

अक़्ल पहुँची जो रिवायात के काशाने तक

एक ही रस्म मिली काबा से बुत-ख़ाने तक

वादी-ए-शब में उजालों का गुज़र हो कैसे

दिल जलाए रहो पैग़ाम-ए-सहर आने तक

ये भी देखा है कि साक़ी से मिला जाम मगर

होंट तरसे हुए पहुँचे नहीं पैमाने तक

रेगज़ारों में कहीं फूल खिला करते हैं

रौशनी खो गई आ कर मिरे वीराने तक

हम-नशीं कट ही गया दौर-ए-ख़िज़ाँ भी आख़िर

ज़िक्र फूलों का रहा फ़स्ल-ए-बहार आने तक

सारी उलझन है सुकूँ के लिए ऐ शौक़ ठहर

ग़म का तूफ़ान-ए-बला-ख़ेज़ गुज़र जाने तक

ज़ेहन मायूस-ए-करम शौक़-ए-नज़ारा सरशार

होश में कैसे रहूँ उन का पयाम आने तक

ज़ख़्म यादों के महकते हैं कि आई है बहार

है ये दौलत ग़म-ए-दौराँ की ख़िज़ाँ आने तक

बे-नियाज़ी है तग़ाफ़ुल है कि बे-ज़ारी है

बात इतनी तो समझ लेते हैं दीवाने तक

ज़िंदगी ग़म से उलझती ही रहेगी हमदम

वक़्त की ज़ुल्फ़ गिरह-गीर सुलझ जाने तक

मंज़िल-ए-राह तलब थी तो कहीं और मगर

रुक गए ख़ुद ही क़दम पहुँचे जो मय-ख़ाने तक

(1279) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554