हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है

हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है

न जाने कितने दुखों को दबाना पड़ता है

अब आ रहा हो कोई जिस्म इस तसव्वुफ़ से

तो हम को हल्का-ए-बैअ'त बढ़ाना पड़ता है

किसी को नींद न आती हो रौशनी में अगर

तो ख़ुद चराग़-ए-मोहब्बत बुझाना पड़ता है

बहुत ज़ियादा हैं ख़तरे बदन की महफ़िल में

पर अपनी एक ही महफ़िल है जाना पड़ता है

ख़ुदा है क़ादिर-ए-मुतलक़ ये बात खुलती है तब

जब उस से काम कोई काफ़िराना पड़ता है

बहुत ज़ियादा ख़ुशी से वफ़ात पा गया हो

तो ऐसे दिल को दुखा कर जिलाना पड़ता है

हमारे पास यही शाइ'री का सिक्का है

उलट-पलट के इसी को चलाना पड़ता है

सुना है तुम मिरे दिल की तरफ़ से गुज़रे थे

इसी तरफ़ तो मिरा कारख़ाना पड़ता है

अजीब तर्ज़-ए-तग़ज़्ज़ुल है ये मियाँ 'एहसास'

कि जिस्म-ओ-रूह को इक सुर में गाना पड़ता है

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