आ के हो जा बे-लिबास

दिन जो कहता है मत सुन

धूप काँधों पर उठाने से भी हट जा

ढेर से ग़ुस्से को अपनी मुट्ठियों में भर के ले आ

शहर भर के मुँह पे मल दे

हर तरफ़ कालक ही कालक पोत दे दीवार-ओ-दर पर

दिन के सब आसार ढा दे

नोच ले आकाश से जलते हुए ख़ुर्शीद को

धूप की चादर को कर दे तार तार

और फिर घर आ के हो जा बे-लिबास

बंद हो जा घर की अंधी कोठरी में

बंद रह लम्बे समय तक

जब तलक सूरज तिरे अपने ही काले ग़ार से

बाहर न झाँके बंद रह

धूप जब तक कोढ़ की सूरत तिरे काले बदन को

फोड़ कर बाहर न निकले बंद रह

जब तलक ग़ुस्से का काला झाग तुझ में खो न जाए

बंद रह बंद रह लम्बे समय तक

ये ग़लत-फ़हमी कि तेरे बंद रहने से

यहाँ कुछ कम हुआ है भूल जा

भीड़ के इतने बड़े जंगल में

कब कुछ कम हुआ है

(1072) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554