अर्श तक जो बे-ख़ता जाता है ये वो तीर है

अर्श तक जो बे-ख़ता जाता है ये वो तीर है

ग़ैर समझा है कि मेरी आह बे-तासीर है

ख़ूगर-ए-क़ैद-ए-वफ़ा पर खुल चुका ज़िंदाँ का राज़

जुर्म थी वो क़ैद ये उस जुर्म की ताज़ीर है

बे-गुनाही से भी बढ़ कर है अगर कोई गुनाह

तो सज़ा-ए-इश्क़ पा कर ख़जलत-ए-तक़सीर है

छोड़ मेरी फ़िक्र ग़ाफ़िल रो ख़ुद अपनी क़ैद पर

जिस को तू ज़ेवर समझता है वही ज़ंजीर है

सिज्न ओ जन्नत दोनों ऐ काफ़िर हैं इस दुनिया के नाम

वो अज़ल से बख़्त-ए-मोमिन ये तिरी तक़दीर है

दार ही बनती है ऐ दिल ज़ीना-ए-मेराज-ए-इश्क़

ख़्वाब-ए-आग़ाज़-ए-मोहब्बत की यही ताबीर है

हो न उलझन जब जुनून-ए-जामा-वर कामिल न हो

जब तलक दामन है ख़ार-ए-दश्त दामन-गीर है

हाथ तो होंगे क़लम पर नामा-बर ये भी कहा

दिल चुरा लेती है पहलू से ये वो तहरीर है

पाएदारी में है क़स्रों से सिवा कच्ची सी क़ब्र

जो क़यामत तक रहे क़ाइम ये वो तामीर है

ख़ून-ए-नाहक़ का किसी के शुबह और तुम पर मगर

सीना-ए-'जौहर' में देखो तो ये किस का तीर है

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