ये इक दोहरी अज़िय्यत है
ये इक दोहरी अज़िय्यत है
अज़िय्यत बे-सबब हँसने की
बे-आराम रातों की कहानी
शब-ज़दों के सामने
हँस हँस के कहने की
ख़ुदावंद ख़ुदा की मेहरबानी है
दुआएँ आप की हैं
आप की सरकार में ज़िंदा हूँ ख़ुश हूँ
बतौर नासेहाँ मिलता है कोई
ब-रंग-ए-मेहरबाँ मिलता है कोई
ब-सई-ए-रायगाँ मिलता है कोई
वो कम-आगाह कम-एहसास कम-आवाज़ लड़की है
वो लड़की मुझ से मिलती है
मगर अंदर उतर जाए तो चुभती है
वो अपनी कम-सवादी जानती है और सिसकती है
अजब सूरत है वो जब भी कहीं जाए तो आ जाए
कहीं रस्ता किनारे मुझ से टकराए तो आ जाए
कभी भी अपनी कज-फ़हमी पे रो जाए तो आ जाए
हवा-ए-शाम की आवाज़ सुन पाए तो आ जाए
हवा-ए-शाम ये कैसी मोहब्बत है
वो लड़की मुझ से मिलती है
मगर अंदर उतर जाए तो चुभती है
वो अपनी कम-सवादी जानती है और सिसकती है
मैं अपनी कम-सवादी जानता हूँ और हँसता हूँ
ये इक दोहरी अज़िय्यत है
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