इक रब्त था ब-रंग-ए-दिगर भी नहीं रहा
इक रब्त था ब-रंग-ए-दिगर भी नहीं रहा
दीवार क्या गिरी कोई दर भी नहीं रहा
अब तक है तू भी और तिरी हैबत भी बे-मिसाल
दिल वो नहीं है दिल में वो डर भी नहीं रहा
क्या हो अगर लबों पे अभी तक है कोई प्यास
सहरा में जब सराब-ए-नज़र भी नहीं रहा
उस ज़ाइक़े से अपनी शनासाई क्या हुई
गो शाख़ वो नहीं वो समर भी नहीं रहा
अब तक कोई क़याम की साअत नज़र न आई
दरपेश अगरचे कोई सफ़र भी नहीं रहा
छूटे हैं ऐसे बार-ए-सफ़र से तमाम लोग
जैसे किसी के दोश पे सर भी नहीं रहा
मर से गए हैं संग-ए-मलामत के वलवले
सर में जुनून-ए-अर्ज़-ए-हुनर भी नहीं रहा
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